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Wednesday, 22 February 2012

आफिस ब्वाय अनमना सा-

बीबी बोकारो बसी,  बैजू है बीमार ।
देख दुर्दशा दीन की, देता रविकर तार ।।
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तार 
बोका रो-रो कर मरे, बोकारो न जाय ।
सर्दी खांसी ज्वर बढ़ा, कोई नहीं सहाय ।।

बैजू होता बावरा, सहे करेजे चोट ।
बोकारो जाए कसक, लेके सौ का नोट ।।

यह विछोह का घाव अब, उससे  सहा न जाय ।
गम की मक्खी भिनभिना, तड़पन रही बढ़ाय ।।

लगे काम में मन नहीं, रती रहित बेकाम ।
यहाँ वहां बेदम खड़ा, बड़ा पुकारे नाम ।।

2 comments:

  1. गरीब का प्रवास ऐसा ही होता है।

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